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उत्तर प्रदेश में बनते दिख रहे नए राजनीतिक समीकरण/सौमिक दुबे



उत्तर प्रदेश देश की राजनीति को सर्वाधिक प्रभावित करने वाला एवं जनाकांक्षाओं का प्रदेश है। इस प्रदेश की एक सबसे बड़ी यह खासियत है कि यहां लोग जैसे सर आँखों पर बैठा सत्ता के शिखर पर पहुंचाते हैं वह जनआक्रोश में आकर सत्ता से बेदखल भी कर देते हैं। ऐसा मैं नहीं बल्कि सूबे का राजनीतिक इतिहास कह रहा, पिछले 20-25 वर्षों में नज़र डालें तो यहां कोई भी सरकार दुबारा रिपीट नहीं हुई है वापसी के लिए उन्हें लम्बा बनवास काटना पड़ा है।


इन सरकारों की वापसी न करने की सर्वाधिक महत्वपूर्ण वजह भूमिहार और ब्राह्मणों का नाराज होना रहा है, 2005 में समाजवादी पार्टी की सरकार इन्हीं जातियों के बैसाखी के सहारे चल रही थी लेकिन तत्कालीन भाजपा विधायक कृष्णानंद राय की हत्या ने इन जातियों का समाजवादी पार्टी से मोह भंग कर दिया फिर यह दोनों जातियां बसपा के साथ 2007 के चुनाव में नज़र आईं और बसपा ने शुरू में बकायदा सम्मान भी दिया लेकिन बामसेफ के लोगों के और बसपा के मुखिया के तानाशाही के चलते इन जातियों ने उस समय विकल्प के तौर पर सपा को चुना और समाजवादी पार्टी ने 1 दर्जन से भी अधिक भूमिहारों और ब्राह्मणों को मन्त्री बनाया।


लेकिन अल्पसंख्यक समुदाय के तरफ अत्यधिक झुकाव तथा सत्ता में एक जाति की अत्यधिक दख़ल के चलते यह लोग 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के साथ खड़े नज़र आये और भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी। वर्तमान समय में भाजपा से 7 भूमिहार एवं 58 ब्राह्मण विधायक हैं लेकिन यह जातियां इस सरकार में भी उपेक्षित नज़र आ रहीं हैं।


उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा क्षेत्रों में से कोई एक भी क्षेत्र ऐसा नहीं है जहां इन जातियों का प्रभाव नहीं है, अकेले भूमिहार (त्यागी) जाति के मतदाता ही सूबे की तक़रीबन 126 विधानसभा क्षेत्रों में हराने तथा जिताने की क्षमता में हैं।

उत्तर प्रदेश का अगर जातिगत समीकरण देखा जाए तो दलित वर्ग के बाद सूबे में सर्वाधिक ब्राह्मण हैं जो तक़रीबन 15•8 फीसद एवं अगर इसमें 3•87 फीसद भूमिहार मतों को जोड़ दिया जाए तो यह आंकड़ा 20 फीसद के आस पास पहुँच जाता है तो की किसी की सरकार बनाने तथा गिराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए पर्याप्त है।



उत्तर प्रदेश की राजनीति का एक वह दौर हुआ करता था जब 100-125 से ज्यादा भूमिहार ब्राह्मण विधायक हुआ करते थे, मात्र पूर्वी उत्तर प्रदेश से ही 17 से 18 भूमिहार विधायक बना करते थे एवं उत्तर प्रदेश में एक ही साथ 3-3 भूमिहार सांसद हुआ करते थे लेकिन बदलते वक्त के साथ राजनैतिक दलों ने इन जातियों से जनसहयोग, धनसहयोग एवं वोट तो ख़ूब लिया लेकिन बदले में जो मान सम्मान वापस देना चाहिए वह नहीं दिया।



वर्तमान समय में देश एवं प्रदेश में सर्वाधिक शोषित तथा पीड़ित कोई जाति है तो वह भूमिहार एवं ब्राह्मण हैं क्योंकि इन जातियों को न तो आरक्षण का लाभ मिला और न ही इन जातियों को इनकी जाति के नेताओं, अधिकारियों ने आर्थिक तौर पर सबल किया। वर्तमान समय में इस जाति के 60 फीसद से ज्यादे लोग ग़रीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं एवं वर्तमान व्यवस्था को कोस रहे हैं।


अगर बात उत्तर प्रदेश की हो तो यहां पिछले कई सालों से ब्राह्मण और भूमिहार राजनैतिक एवं आर्थिक रूप से हाशिये पर जाते नज़र आ रहे हैं। किसी जमाने में कई बार ब्राह्मण मुख्यमंत्री रहे और हर बार कई दर्जन भूमिहार विधायक एवं मंत्री रहे। आज की स्थिति यह है कि ब्राह्मण और भूमिहार बहुल सीटों पर भी अन्य जाति के लोग चुनाव लड़ और जीत रहे हैं। उसी प्रकार नेतृत्व में भी इन दोनों जातियों की उपेच्छा होती देखी जा रही है, इतना ही नहीं बल्कि इनके साथ शारीरिक अपराध एवं अन्य अत्याचार की घटनाएँ भी रोज़ ब रोज़ हो रही हैं। सर्व विदित है कि सैकड़ों ब्राह्मणों की हत्याएँ हाल में हुई हैं, इन जाति के अधिकारियों पर भी अन्याय और अत्याचार हुए हैं। ब्राह्मणों का कहना है कि इन घटनाओं एवं दुराचारों के पीछे शासन की शह और एक जाति विशेष का आक्रामक रवैया है। इस बात में काफ़ी तथ्य है ऐसा निष्पक्ष लोगों के द्वारा भी बताया जा रहा है।  


एके शर्मा के राजनीतिक रूप से सक्रिय होने से भूमिहार तथा ब्राह्मण वर्ग को एक उम्मीद की आस दिखी थी लेकिन सरकार में उनको सम्मान न मिलने से यह वर्ग बेहद नाराज़ है तथा इस वर्ग की नाराज़गी सरकार को भारी पड़ सकती है।


ब्राह्मण यह भी कहते हैं कि विभिन्न पार्टियों ने उनका सिर्फ़ उपयोग किया। किसी ने कुछ दिया नहीं, भूमिहार उससे भी ज़्यादा नाराज़ हैं क्योंकि भूमिहारों का कहना है कि एक बार उन्हें मनोज सिन्हा के नाम पर अपमानित किया गया और अब अरविन्द शर्मा के नाम पर अपमानित किया जा रहा। भूमिहारों का कहना है कि हम न तो अपराधी हैं और न ही ठेकेदार हैं इसलिए हमें सत्ता के संरक्षण की कतई जरूरत नहीं है लेकिन ऐसे ही हमारे जाति के नेताओं का अपमान हुआ तो हम भी तख्ता पलट करना जानते हैं।

भूमिहार खेती के आधार पर स्वयं सक्षम है इसलिए सरकार से उनकी सीधी उमीदें कम हैं लेकिन सम्मान की भूख तो है ही। ये दोनों जातियाँ यह भी कह रही हैं कि पिछले दो-तीन दशकों में उनकी नेतागीरी कमजोर रही है। इसलिए नए नेता की तलाश थी जो ए के शर्मा के आने से सफल हो गयी लेकिन उनका यह अफ़सोस है कि उनकी बड़ी जनसंख्या होने के बावजूद अभी तक वो लोग विभाजनकारी राजनीति का शिकार होते रहे हैं। 


ब्राह्मण कहते हैं कि सन् 2016 में तत्कालीन मुख्य सचिव उत्तर प्रदेश सरकार श्री आलोक रंजन की अध्यक्षता में राज्य सरकार ने उत्तर प्रदेश में एक आंतरिक शासकीय सर्वे करवाया था जिसको सार्वजनिक नहीं किया गया। लेकिन 2017 विधानसभा चुनाव इसी गणना के आँकड़ों का उपयोग करके लड़े गए। उसी समय अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा के राष्ट्रीय  अध्यक्ष द्वारा 75 जिलों के ब्लॉक एवं गांव में निवास करने वाले ब्राह्मण समाज की सूची तत्कालीन सरकार से माँगी गयी थी। 


उस सर्वे में  यह पाया गया कि ब्राह्मण समाज विभिन्न क्षेत्रों में प्रजाति और गोत्र के अनुसार विभाजित है। जो कि मुख्य रूप से शुक्ला, द्विवेदी, त्रिवेदी, चतुर्वेदी, दुबे, तिवारी, पांडेय, चौबे, उपाध्याय, पाठक,  मिश्रा, शास्त्री, विद्यार्थी, शर्मा, शांडिल्य, भारद्वाज, वशिष्ठ, पराशर, व्यास, भूमिहार-ब्राह्मण, बंदोपाध्याय,चटर्जी, बनर्जी चक्रवर्ती, खत्री और खन्ना आदि में विभाजित हैं ।ब्राह्मणों में तमाम उपजातियां भी शामिल हैं जिसमें भट्ट ,गिरी, (गोसाई ), गौड़ और मृत्यु उपरांत कर्मकांड कराने वाले ब्राह्मण ( महापात्र) इत्यादि शामिल हैं। कुछ प्रजातीयों का भौगोलिक वर्गीकरण भी है। जैसे शाक्ल्यदीपी, सरयूपारी, कान्यकुब्ज। कुछ क्षेत्रों में लिखे जाने  वाले  सनाढ्य, पचौरी जैसे उपनाम, गोत्र और प्रवर भी ब्राह्मण समुदाय में शामिल हैं ।


इनमें 3•87 % भूमिहार (ब्राह्मण) भी है जिनमें त्यागी, राय, शाही, पांडेय, मिश्रा, तिवारी, द्विवेदी, कुमार, वत्स, भारद्वाज, शर्मा एवं सिंह आदि लिखने वाले लोग हैं लेकिन भूमिहारों के अत्यधिक उपनाम होने की वजह से कोई इस जाति का सटीक आकलन नहीं कर पाता। ब्राह्मण एवं भूमिहार की उत्पत्ति एवं संस्कार एक हैं। परशुराम भगवान दोनों के आराध्य हैं, इन दोनों में कभी कोई मतभेद नहीं रहा। कोई कारण नहीं होते हुए भी कई बार इनका राजनैतिक दृष्टिकोण अलग रहा है लेकिन वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए अब इन दोनों जातियों ने एक साथ रहने का मन बना लिया है। 


इस पुख़्ता तथ्यों के आधार पर इन दोनों जातियों ने अब ध्रुवीकरण की साझा रणनीति अपनायी है। उन्होंने संगठित होकर पुराने तथ्यों पर आधारित एक गणना की है। इस आधार पर जो तथ्य उभरकर सामने आए उसमें यह प्रमाणित हो रहा है कि उत्तर प्रदेश के कुल मतदाताओं का 15•8 प्रतिशत यानी 16 प्रतिशत या उससे से भी अधिक ब्राह्मण और 3•87 प्रतिशत भूमिहार मतदाता हैं। इस प्रकार किसी एक ख़ास जाति या वर्ग की बात की जाए तो अनुसूचित जाति के बाद सबसे बड़ा वर्ग ब्राह्मण-भूमिहार का है। 


सर्वे का मुख्य आधार जिलों और तहसीलों में उपस्थित चुनाव हेतु जनगणना एवं पल्स पोलियो अभियान के तहत पारिवारिक विवरण एवं अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा के सर्वे को तथा 2016 में  उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की जनसंख्या प्रतिशत को आधार माना गया जिसके आधार पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश , बुंदेलखंड में ब्राह्मणों की संख्या कम तथा अवध प्रांत एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण जनसंख्या घनत्व अधिक पाया गया, पूर्वी उत्तर प्रदेश में तो

भूमिहार ब्राह्मणों का प्रतिशत 23-24 तक जाता है। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश में वही पार्टी जीतती है और उसी पार्टी की सरकार होती है जिसको भूमिहार ब्राह्मण वर्ग का समर्थन हो, जैसे पहले कांग्रेस फिर बसपा, सपा और वर्तमान में भाजपा। 


इस प्रकार प्रदेश की लगभग पाँचवां हिस्सा ब्राह्मण है। इनमें 30% परास्नातक, 20% स्नातक 10% इंटरमीडिएट एवं 20% हाई स्कूल पास तथा साक्षर हैं परंतु 30% ब्राह्मण-भूमिहार भूमिहीन, निर्धन एवं गरीब हैं। उनका जीवन स्तर दलितों से भी बदतर है। 


इन जातियों में एक ख़ासियत यह है कि सभी समाज के लोग इनको प्रेम करते हैं तथा सबकी मदद के लिए सदैव तैयार रहते हैं, वैमनस्य इनके स्वभाव में नही है। इसी जाति से ताल्लुक रखने वाले नेता ए के शर्मा का स्पष्ट रुप से एक ही मूल मंत्र है - सबका साथ सबका विकास। इसलिए ब्राह्मण-भूमिहार के साथ वो अन्य जातियों के लिए भी आकर्षण के केंद्र बने हुए हैं। विशेष रूप से अनुसूचित जातियों के उपरांत अति पिछड़ी जातियों जैसे कि निषाद, गोड़, कुर्मी, मौर्य एवं राजभर नेताओं से उनके निकट के व्यक्तिगत सम्बंध विकसित हो गए हैं। सनातन संस्कृति एवं पूजा पद्धति में पूर्ण डूबे हुए होने के साथ साथ उनके स्वभाव में कमजोर वर्गों के प्रति संवेदनशीलता देखने को मिलती है।  


अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इसका कितना लाभ भाजपा ले पाती है क्योंकि ब्राह्मण और भूमिहार वर्ग को एके शर्मा के जरिये अपना मान सम्मान बचता दिख रहा है, इन वर्ग के लोगों का कहना है कि अबतक बहुत पिछलग्गू की भूमिका में रह लिए लेकिन अब हमें ऐसा नेता चाहिए जो हमारे मान सम्मान के लिए खड़ा हो सके।


सौमिक दुबे

स्वतन्त्र विचारक

यह तो होना ही था ! विधानसभा चुनाव के सेमीफाइनल में भाजपा का लहराया परचम / अशोक मधुप


चुनाव शुरू होने से ही कुछ लोग इसे राजनैतिक रंग देने में लगे थे। वे इसे अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल बता रहे थे। भाकियू के दिल्ली बार्डर पर चल रहे आंदोलन के मद्देनजर कुछ विश्लेषकों का कहना था कि इस चुनाव में भाजपा को भाकियू की नाराजगी का सामना करना पड़ेगा।

उत्तर प्रदेश में बहु प्रतिक्षित जिला पंचायत चुनाव संपन्न हो गया। हर बार की तरह इस चुनाव में सत्ता बल और धनबल विजयी रहा। सिद्धांत और विचार धारा कूड़े में पड़ी नजर आईं। विचारधारा गौण हो गई। प्रदेश की 75 जिला पंचायत सीट में से 67 पर भाजपा विजयी रही। दो सीट पर उसके समर्थक दल का कब्जा रहा। सपा को सिर्फ पांच सीट मिली। एक सीट रालोद को गई। पश्चिमी इलाके में सपा- रालोद और भाकियू का गठबंधन कोई भी करिश्मा नहीं कर सका। अपने गढ़ मुजफ्फर नगर में भारतीय किसान यूनियन का प्रत्याशी मात्र चार वोट पाकर ही घर बैठ गया। रालोद-भाकियू के गढ़ पश्चिम उत्तर प्रदेश की 14 सीट में से 13 पर भाजपा ने विजय पताका फहराई। 

चुनाव शुरू होने से ही कुछ लोग इसे राजनैतिक रंग देने में लगे थे। वे इसे अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल बता रहे थे। भाकियू के दिल्ली बार्डर पर चल रहे आंदोलन के मद्देनजर कुछ विश्लेषकों का कहना था कि इस चुनाव में भाजपा को भाकियू की नाराजगी का सामना करना पड़ेगा। वह ये भूल गए कि ये चुनाव सत्ता का चुनाव है। सत्ता में जो दल होता है, उसके ही प्रत्याशी प्रायः विजयी होतें हैं। 2016 में समाजवादी पार्टी की सरकार में सपा के 26 जिला पंचायत अध्यक्ष निर्विरोध चुने गए थे। जबकि इस बार भाजपा के 21 जिला पंचायत अध्यक्ष निर्विरोध बने। एक सपा का भी जिला पंचायत अध्यक्ष निर्विरोध चुना गया। सपा सरकार में 2016 के चुनाव में सपा के 63 जिला पंचायत अध्यक्ष चुने गए थे। इस बार भाजपा और उसके समर्थक दल के दो अध्यक्ष मिला कर कुल 69 चुने गए हैं।

बसपा ने तो पहले ही चुनाव लड़ने से मना कर दिया था। सपा- रालोद मिलकर चुनाव लड़ रहे थे। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भारतीय किसान यूनियन भी इनके साथ थी। इसके बावजूद यह शुरूआत से ही बैकफुट पर रहे। इस चुनाव में आम जनता मतदान नहीं करती है बल्कि जनता से चुने गए सदस्य मतदान करते हैं। मीडिया रिपोर्टों में यहां तक कहा गया कि इनकी खुलकर बोली लगती है। निर्धारित राशि तै हो जाने पर सदस्य प्रत्याशी के साथ चले जाते हैं। इस बार सदस्य का रेट 15 से 20 लाख के आसपास रहा। विजेता को पांच- छह करोड़ के आसपास रूपया व्यय करना पड़ा।

चुनाव की विशेष बात यह रही कि इसमें जमकर क्रास वोटिंग हुई। बिजनौर जनपद में भाजपा के आठ सदस्य विजयी हुए थे। अन्य दल के इस प्रकार थे। सपा 20, रालोद चार भाकियू दो,असपा आठ , बसपा पांच अन्य छह। सपा,रालोद और भाकियू के दो सदस्य मिलाकर 26 सदस्य हो रह थे। लग रहा था कि सपा प्रत्याशी विजयी होगा। किंतु 26 की जगह सपा को 25 ही वोट मिले। भाजपा के साकेंद्र चौधरी 30 मत पाकर विजयी रहे। 

मुजफ्फरनगर में अकेले भाकियू ने अपना प्रत्याशी लड़ाया। यह भाकियू का गढ़ है। भाकियू को अपने गढ़ में ही बुरी तरह पराजय हाथ लगी। उसके प्रत्याशी सत्येंद्र बालियान को कुल चार मत मिले। इस सीट पर भाजपा के 13 सदस्य ही विजयी हुए थे। भाजपा इन तेरह की बदौलत तीस तक पंहुच गई। भाजपा प्रत्याशी 26 मत से विजयी रहा।आठ में से पांच मुस्लिम सदस्यों ने भी भाजपा प्रत़्याशी को वोट किया। नौ मतदाताओं ने मतदान नही किया। रालोद-भाकियू के गढ़ पश्चिम उत्तर प्रदेश की 14 सीट में से 13 पर भाजपा ने विजय पताका फहराई। अकेले बागपत में ही रालोद का प्रत्याशी विजयी रहा।

चुनाव संपन्न हो गया । अगर इसे विधान सभा चुनाव का सेमीफाइनल माने तो भाजपा पूर्ण बहुमत से भी आगे निकल गई। वैसे इस चुनाव को विधान सभा चुनाव का सेमी फाइनल कहना गलत है। इतना जरुर है कि ये भाजपा के 67 और दो गठबंधन के कुल 69 जिला पंचायत अध्यक्ष विधान सभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशियों को विजय दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। आगामी चुनाव में प्रत्याशी के पक्ष में मजबूती के साथ खड़े होंगे।

- अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

विचारधाराओं के भंवरजाल में फंसे युवा /दिव्येन्दु राय


जैसे किसी लड़की की शादी में बुआ का लड़का आकर बहुत सारा काम कर देता है वही हाल चुनाव में कार्यकर्ताओं का होता है, शादी के बाद न तो कोई बुआ के बेटे को खोजता है और न ही विधायक, मन्त्री बना व्यक्ति कार्यकर्ता को.

क्या आपने देखा है किसी लड़की के पिता को अपने बहन के लड़के को शादी बाद खोजकर उसके भविष्य को सुरक्षित करने की कोशिश करते हुए? क्या आपने कभी देखा या सुना है किसी विधायक, मन्त्री को अपने चुनाव में काम किये हुए कार्यकर्ताओं को रोजगार अथवा काम देते हुए? जहां तक मुझे पता है ऐसा आपने शायद ही कभी सुना या देखा होगा लेकिन इसकी भी उम्मीद मुझे मात्र 0.1 फिसद ही है.


किसी आइडियोलॉजी को मानना अच्छी बात है लेकिन सम्बन्धित विचारधारा से जुड़े नेता चाहते हैं कि आप उस विचारधारा के प्रति इस कदर समर्पित हो जाईये कि उसके अलावा आपको कोई अन्य विचारधारा समानांतर लगे ही नहीं वह इसलिए ऐसा चाहते हैं ताकि आप उनके किसी काम पर चाह कर भी प्रश्नचिन्ह न उठा सकें. जैसे अगर उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार है और किसी इंजीनियरिंग ग्रेजुएट बेरोजगार ने आत्महत्या कर ली तो कोई भाजपा से जुड़ा हुआ व्यक्ति इसमें सरकार की आलोचना नहीं करेगा वहीं अगर दिल्ली में अगर किसी बेरोजगार ने आत्महत्या कर ली तो आम आदमी पार्टी से जुड़ा हुआ व्यक्ति सरकार की आलोचना नहीं करेगा. इसलिए अगर आप बेरोजगार हैं तो आपकी आइडियोलॉजी रोजगार पाना होना चाहिए न कि सोशल साइट्स पर नेताओं और पार्टियों के लिए तू-तू, मैं-मैं करना होना चाहिए. राजनीतिक दल के नेता आपके घर कौन सी सब्जी बनेगी, आटा कैसे पिसायेगा उसकी चिन्ता नहीं करते बल्कि वह यह चाहते हैं कि उनसे जुड़े कार्यकर्ता उक्त नेता की, सम्बन्धित विचारधारा वाले दल की कमियों को छुपाएं तथा उनका बचाव करें.


युवाओं का समय के साथ विचारधारा बदल देना फिर भी ठीक है लेकिन विचारधारा के नाम पर भ्रमित कर देने वालों के साथ रहना बिल्कुल ठीक नहीं होता है, हाँ कुछ लोग यह जरूर कहेंगे कि कहाँ पहले थे अब कहाँ चले गए लेकिन वह न तो आपके घर पर सरसों का तेल पहुंचाने जाएंगे और न ही आपकी बाइक में पेट्रोल डलवायेंगे.


"कहने वाले तो यहां तक कहते हैं कि फ़लाना लड़का एकदम असामाजिक है, किसी से मतलब नहीं रखता लेकिन उन्हें यह नहीं पता होता कि कुछ लड़के सामाजिक बनने के लिए नहीं बल्कि समाज को बदलने के लिए होते हैं और इसलिए ही समाज से दूर रहकर पढ़ाई करते हैं."


आजकल आप अभी कुछ लाइने लिखकर सोशल साइट्स पर कोई फ़ोटो पोस्ट करेंगे तो लोग आठ कदम आगे तक का सोच लेते हैं एवं अनुमान लगाकर जजमेंट देने में देर नहीं करते जबकि वह खुद अपने वोट के साथ ही न्याय नहीं कर पाते कि वह अपना वोट जिस व्यक्ति को दिए होते हैं क्या वह व्यक्ति ही सबसे योग्य था उक्त प्रत्याशियों में?


देश की पहली संसद में 9 फीसद सांसद किसी बड़े, राजनीतिक परिवार से जुड़े थे, वर्तमान समय की संसद में 40 वर्ष से कम उम्र के 98 फीसद सांसद किसी न किसी राजनैतिक व्यक्ति के रिश्तेदार हैं और उनकी लीगेसी को आगे बढ़ा रहे हैं.


अगर आपको लगता है कि आप किसी नेता का झण्डा ढोकर, जय जयकार करके नेता बन जाएंगे तो यह गलत है. किसी नेता को क्या आन पड़ी कि वह आपकी चिन्ता करे, अब भला देश के गृहमंत्री मेरी क्यों चिन्ता करेंगे कि दिव्येन्दु को 2022 में घोसी से प्रत्याशी बना दिया जाए या राज्यमंत्री बना दिया जाए. नेता आपकी चिन्ता तभी करते हैं जब आप उनके लिए या तो लाभदायक होते हैं या नुकसानदायक, लाभदायक होने की दशा में आपको साथ जोड़ा जाता है और नुकसानदायक होने की दशा में आपको मैनेज किया जाता है. राजनीति का वह दौर गया जब आपके संघर्ष और त्याग को मान दिया जाता था, वर्तमान युग में धन,जाति एवं बाहुबल को मान दिया जाता है.


युवा सही समय पर विचारधारा के घुप अंधेरे से बाहर नहीं निकल पाते तो एक वक्त बाद परिस्थितियों के चलते उनकी विचारधारा कमाने, खाने और परिवार पालने में सिमट कर रह जाती है. उन्हें अपनी गलती का एहसास तब होता है जब उनसे कम योग्य लोग विधायिका में अपनी ताकतों को दुरुपयोग करते दिखते हैं और उनकी बदौलत उनके परिजन, उनके रिश्तेदार आम लोगों से रौब में बात करते हैं. 


उस समय वही युवा जो कभी किसी नेता के लिए झण्डा ढोये होते हैं वह समाज से खुद को काट लेते हैं क्योंकि उनके ऊपर परिवार की बहुत जिम्मेदारियाँ आ गईं होती हैं और आय का स्रोत समिति होता है, उनके पास न इतना वक्त बचता है कि वह समाज को बदलने की सोच सकें और तो और कुछ ही सालों बाद वह नेता भी ठीक से नहीं पहचानता जो पहले हर बात पर पीठ ठोक शाबासी दिया होता है.

फिर भी जब आप कभी किसी मुसीबत में फंस कर उक्त नेता के पास अपनी गुहार लेकर जाते हैं तो वह पहले अपना राजनीतिक लाभ और हानि देखता है उसके बाद कई दिन आपको अपने पीछे घुमाता है फिर या तो टाल देता है या फिर किसी लाभ को देखकर आपके लिए एक फोन कॉल करके पैरवी कर देता है.


इसलिए वर्तमान समय में युवाओं को राजनीतिक दलों का झण्डा ढोने से पहले खुद के परिवार के उम्मीदों के झण्डे को ढोने की जरूरत है. किसी विचारधारा के लिए लड़ने से पहले खुद के और अपनों के ख़्वाबों के लिए लड़ने की जरूरत है, क्योंकि देशभक्ति देश के लिए इनकम टैक्स देकर की जाती है न कि सोशल साइट्स पर लिखकर और अपने परिजनों को दुखी कर, उनके सपनों को तोड़कर.


दिव्येन्दु राय

स्वतन्त्र टिप्पणीकार & राजनैतिक विश्लेषक

पीएम अब कारगिल-लद्दाख के नेताओं से करेंगे बात

एक जुलाई को बुलाई बैठक




केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर को लेकर सर्वदलीय बैठक बुलाने के बाद अब कारगिल और लद्दाख की पार्टियों के नेताओं से मुलाकात करने की पहल की है। इसके तहत 1 जुलाई को कारगिल और लद्दाख के नेताओं और समाजसेवियों को बैठक के लिए आमंत्रित किया गया है। कश्मीर की मौजूदा स्थिति और भविष्य को लेकर केंद्र सरकार यह पहल कर रही है। 24 जून को हुई सर्वदलीय बैठक के संबंध में पीएम मोदी ने जम्मू-कश्मीर के नेताओं से कहा था कि दिल की दूरी और दिल्ली की दूरी को खत्म करने के लिए यह बैठक हुई। बैठक के बाद पीएम मोदी ने ट्वीट कर कहा कि हमारे लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत एक मेज पर बैठने और विचारों का आदान-प्रदान करने की क्षमता है।

24 जून की बैठक के बाद पीएम मोदी ने कहा था कि उन्होंने जम्मू-कश्मीर के नेताओं से अपील की है कि लोगों को, खासकर युवाओं को जम्मू-कश्मीर को राजनीतिक नेतृत्व देना है और यह सुनिश्चित करना है कि उनकी अपेक्षाएं पूरी हों। सर्वदलीय बैठक में आठ दलों के 14 नेता शामिल हुए थे। इन नेताओं में नेशनल कॉन्फ्रेंस के वरिष्ठ नेता फारूक अब्दुल्ला, उनके पुत्र व पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) की प्रमुख महबूबा मुफ्ती और पूर्व केंद्रीय मंत्री गुलाम नबी आजाद प्रमुख रूप से मौजूद थे। 

इस सर्वदलीय बैठक के बाद कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा था कि सरकार के सामने उन्होंने कुछ मांगें जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा मिले, तुरंत चुनाव कराने और कश्मीरी पंडितों पर ध्यान देने, अनुच्छेद 370 के प्रावधान खत्म होने के बाद से हिरासत में लिए गए नेताओं को छोड़ने  आदि की रखी। इसके अलावा जम्मू-कश्मीर में युवाओं को रोजगार और जमीन की गारंटी देने की भी सरकार से मांग की है।

अब डरा रहा डेल्टा प्लस



कोरोना महामारी की दूसरी लहर कमजोर पड़ने के बाद देश ने अभी राहत की सांस ली भी नही है कि अब डेल्टा प्लस दस्तक दे चुका है। केंद्र सरकार लगातार हालात की समीक्षा कर रही है। अब तक 12 राज्यों में डेल्टा प्लस के 52 केस मिले हैं। मप्र में दो की मौत हो चुकी है। मौत उन्हीं लोगों की हुई है, जिन्हें वैक्सीन नहीं लगी थी। वैक्सीन इस वेरिएंट से भी बचाव में मदद्गार होगी। 

हिंदू साम्राज्य दिवस पर व्याख्यान​

 भारतीय प्रज्ञान परिषद प्रज्ञा प्रवाह मेरठ प्रांत और नोएडा इकाई द्बारा "हिंदू साम्राज्य दिवस" पर "शिवाजी महाराज की राज्य और पर्यावरण संरक्षण व्यवस्था" पर व्याख्यान​ 




हिंदू साम्राज्य दिवस पर भारतीय प्रज्ञान परिषद मेरठ प्रांत और नोएडा इकाई द्वारा अलग-अलग संपन्न हुआ। कार्यक्रम का संचालन भारतीय प्रज्ञान परिषद के जिला मीडिया प्रबंधन डॉ अमित अवस्थी और धन्यवाद ज्ञापन डॉ दिनेश शर्मा ने किया। कार्यक्रम क्षेत्र संयोजक माननीय भगवती प्रसाद राघव जी के सानिध्य में संपन्न हुआ! कार्यक्रम में मुख्य वक्ता प्रांत शोध संयोजक डॉ शीला टावरीजी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जिला प्रचारक श्रीविशालजी, गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर भगवती प्रकाश शर्मा रहे। नोएडा इकाई द्वारा कार्यक्रम गूगल मीट एप पर संपन्न हुआ। मेरठ प्रांत फेसबुक कार्यक्रम प्रबंधन प्रांत संयोजक इंजी. अवनीश त्यागी द्वारा रहा। मेरठ प्रांत कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रोफेसर बीरपाल सिंह की उपस्थिति द्वारा हुई!

कार्यक्रम की मुख्य वक्ता के रूप में डॉ शीला टावरीजी रही जिन्होंने भारत के प्राचीन इतिहास पर प्रकाश डालते हुए महाराजा छत्रपति शिवाजी के बारे में बताया ।उन्होंने महाराज शिवाजी के जीवन से संबंधित विभिन्न घटनाओं को श्रोताओ के सामने रखा जिससे सभी प्रबुद्ध चिंतको एवम श्रोताओ को बहुत ही प्रेरणा  मिली । आपने बताया कि जब अफजल खान छत्रपति शिवाजी महाराज से मिलने के लिए उनके यहां आना चाहता था तो किस प्रकार से शिवाजी महाराज ने अफजल खान के मंसूबों पर पानी फेर दिया था ,अफजल खान बहुत ही ज्यादा  कपटी और धोखेबाज  बादशाह था वह चाहता था कि मैं छत्रपति शिवाजी को सन्धि के बहाने उसके यहां जाकर धोखे से मौत के घाट उतार दूंगा इसीलिए उसने शिवाजी के यहां जाने की योजना बनायी।  वह छत्रपति शिवाजी महाराज से डेढ़ गुना लंबा और 4 गुना वजनदार था उसे इस बात का अभिमान था कि वह शिवाजी को अपनी मुट्ठी में बोचकर मार डालेगा परंतु उस मूर्ख को छत्रपति शिवाजी की सूझबूझ और बुद्धिमत्ता का ज्ञान नहीं था। जब उसके आग्रह पर छत्रपति शिवाजी ने उस का प्रस्ताव स्वीकार किया और उसे अपने यहां मिलने के लिए बुलाया तब   शिवाजी महाराज जानते थे कि यवनो को वैभवशाली महल और शान शौकत अधिक प्रिय हैं इसीलिए उन्होंने उसके लिए बहुत ही सुंदर और मनोरम स्थान पर मिलने का प्रस्ताव भेजा उधर अफजल खान भी अपनी पूरी तैयारी के साथ था उसने लगभग 32000 यवनों को अपने साथ सेना के रूप में रखा हुआ था वह चाहता था कि मौका पड़ने पर वह शिवाजी और उसके साम्राज्य को खत्म कर देगा। परन्तु इधर छत्रपति शिवाजी महाराज ने अपने सैनिकों को भी पर्दो के पीछे छुपा कर रखा रखा था उनकी दूरदृष्टि यह कहती थी की अफजल खान जैसा  बेईमान प्यार मोहब्बत का नाटक करके धोखा जरूर देगा इसीलिए शिवाजी ने अपने यहां का पूरा पुख्ता प्रबंध किया हुआ था। छत्रपति का विचार था की यदि अफजल खान सच में ही संधि करना चाहता है तो ठीक बात है उसको जाने देंगे परन्तु यदि उसने जरा सी भी होशियारी दिखायी तो उसे अच्छा जवाब दिया जाएगा। शिवाजी के सभी सैनिक पूरी तरह से तैयार थे । शिवाजी ने सुरक्षा का ध्यान रखते हुए अपनी पगड़ी के  नीचे एक लोहे का कवच पहना हुआ था और अपना धातु का अंगवस्त्र पहन कर उसके ऊपर कपड़े धारण किए थे और उंगली में अंगूठी के रूप में जहर लगे हुए औजार पहने हुए थे ।इस तरह की दूरदर्शिता छत्रपति शिवाजी  में विद्यमान थी । जब अफजल खान शिवाजी के दरबार में आया तो शिवाजी लगभग ढाई घंटे तक उसके सामने नहीं आए अफजल खान को लग रहा था की शिवाजी  उससे भयभीत है जिसके कारण वह सामने नहीं आ रहा है परन्तु शिवाजी की आंतरिक भावों उसे कहां मालूम थे शिवाजी ढाई घंटे बाद धीरे-धीरे पैर रखता हुआ अफजल खान के सामने आया ।अफजल खान शिवाजी को देखकर बोला ,"आओ शिवा आओ ,  मेरे गले लग जाओ"  जब शिवाजी उसके  करीब आया तो अफजल खान ने शिवाजी पर चाकू से वार करते हुए उसे मारने का प्रयास किया परंतु शरीर में दुबला पतला होने के बावजूद भी शिवाजी ने अपने साहस और चतुराई से वह खंजर अफजल खान के सीने में ही घोप दिया और  सैनिकों को आदेश दे दिया कि आक्रमण कर दे । उन 7000 सैनिकों ने 32000 यवनो को मौत के घाट उतार दिया । इस प्रकार के चातुर्य और ज्ञान के साथ छत्रपति शिवाजी ने अफजल खान जैसे हैं विशालकाय दानव पर विजय प्राप्त की ।

इसी के साथ साथ डॉ शीला टावरीजी ने एक ग्वालन के किस्से पर भी प्रकाश डाला जिसमें उस ग्वालिन के चातुर्य का परिचय मिलता है उसके बारे में बताते हुए कहा कि  वह महिला बड़ी निडर और साहसी थी उसने लगभग समुद्र तल से 4400 फीट ऊंची गढ़ से भागकर अपनी और अपने बच्चे की सुरक्षा किस प्रकार से की है यह विचारणीय और प्रशंसनीय है उसने उस ऊंचाई से आने वाली  कंदरा  मैं से रास्ता खोज कर नीचे आने का प्रयास किया और वह पूर्णता सफल भी हुई जब नीचे उसे छत्रपति शिवाजी मिले तो उन्होंने उसकी भूरी भूरी प्रशंसा की और उस स्थान का नाम हिरकणी  बुर्ज रखा आज तक बहुत ही प्रसिद्ध है, हिरकनी उस  ग्वालिन का ही नाम था। यदि हम शिवाजी के राज्य प्रबंधन का जिक्र करे तो वह भी विशिष्ट है क्योंकि छत्रपति शिवाजी ही ऐसे राजा हुए हैं जिन्होंने अष्टप्रधान मंत्री मंडल की स्थापना की थी राज अभिषेक के बाद  उन्होंने आठमंत्रियों में विभाग वितरित कर दिए थे । उनमें से प्रत्येक मंत्री अपने स्थान की खबरें सीधे राजा तक पहुंचाते थे फिर शिवाजी इस पर संज्ञान लेते थे । छत्रपति शिवाजी का मानना था कि किसी देश या राज्य में एक ही भाषा का प्रयोग प्रशासन कार्यो में होना चाहिए प्रशासनिक कार्य एक ही भाषा में हो तो जनता को दुविधा नही होती यदि किसी राज्य में विभिन्न प्रकार की भाषाएं प्रयोग की जाएंगी तो वहां की जनता को भाषाओं को समझने में बड़ी दिक्कत होगी उन्हें यह भी मालूम  नहीं होगा कि उनके साथ क्या हो रहा है इसीलिए उन्होंने राज्य भाषा कोष की स्थापना की जो कि बहुत ही प्रशंसनीय है। 

डॉ०शीला टावरीजी ने ऐसा बताते हुए कहा कि जब औरंगजेब राजा था शिवाजी ने  औरंगजेब को कहा था कि," क्या मुग़ल साम्राज्य इतना दरिद्र और गरीब हो गया है जो उसने जनता पर जजिया कर लगा डाला"  ऐसे निडर महान शासक शिवाजी थे ।  जब यह सब हो रहा था उस समय आपने स्वराज्य की स्थापना की जिसके चलते आपने राज्य में कृषि की तरफ विशेष ध्यान दिया । यदि कृषि कार्यों में लोग लिप्त रहेंगे और फसलें होंगी तभी राज्य से भुखमरी और अकाल को खत्म किया जा सकता है एक पोषित राज्य की स्थापना की जा सकती है ऐसी कहावत है कि ,"भूखे पेट ना होय भजन गोपाला " सिद्ध होती है यदि किसी राज्य में भुखमरी होगी वहां की जनता कुपोषित हो जाएगी बीमारियों से पीड़ित होकर सभी लोग मर जाएंगे राज्य में ऐसा नहीं होना चाहिए इसीलिए शिवाजी ने कृषि की ओर विशेष ध्यान दिया। उन्होंने कृषि के लिए जल की व्यवस्था करने का पूरा प्रयास किया जिसमे वे सफल भी हुए,  वर्षा के जल को रोककर बांध बनाए गए  तालाब खुदाई की गई जिससे कृषि के लिए  पानी और पेयजल की व्यवस्था की गई । पुणे में आज भी पार्वती नाम की पहाड़ी के पास एक बांध है ,एक बांध  कोंडवा स्थान पर बना हुआ है जो शिवाजी के ही समय के है। शिवाजी को कृषि का ज्ञान इतना अधिक था कि  जिसकी कोई सानी नही हो सकती। शिवाजी हमेशा फसल चक्र को अपनाने के लिए जोर देते थे जिससे फसलों को नुकसान देने वाले कीड़े मकोड़े नष्ट हो जाये और दूसरी फसलों के साथ नुकशान न  पहुंचाए।विभिन्न  प्रकार की फसलों की उपज पैदा हो । यदि राज्य में अकाल भुखमरी ,बाढ़ ,अनावृष्टि जैसी आपदाय भी आ जाती थी तो वहां की जनता को  धन ना देकर उनको कृषि यंत्र दिए जाते थे जिनमें हल और बैल की जोड़ी प्रमुखता से दी जाती थी । छत्रपति शिवाजी को अपने राज्य के लोगों के साथ हल चलाते हुए भी दिखाया गया है जिससे यह पूर्णतया स्पष्ट होता है कि छत्रपति शिवाजी कृषि के प्रति आस्थावान थे कृषि और धरती मां को राज्य लक्ष्मी कहते थे।  कृषि के पश्चात उन्होंने पेड़ों पर विशेष ध्यान दिया क्योंकि पेड़ वातावरण के लिए अति आवश्यक होते हैं जिससे पर्यावरण भी शुद्ध रहता है और इनसे नाव बनाने में भी बहुत ही लाभ मिलता है शिवाजी आम और कटहल जैसे फलदार वृक्षों को काटने से सदैव मना करते थे और जो फलदार वृक्ष सुख जाते थे केवल उनकी ही  कटाई की जाती थी उनका मानना था कि पेड़ों में  भी जीव होता है जिससे उन्हें कटने पर दुख होता था। छत्रपति शिवाजी को वेदों का भी ज्ञान था इनकी बातों से ऐसा प्रतीत होता था उन्होंने वेद अच्छे से पढ़ रखे हो । छत्रपति शिवाजी नौसेना के जनक भी कहे जाते हैं उन्होंने ही सर्वप्रथम नौसेना की स्थापना की। वह धार्मिक जरूरत है परंतु अंधविश्वासी नहीं थे उन्होंने सदैव अंधविश्वास का खंडन किया है प्राचीन काल में कहावत है कि कभी समुद्र को लांघना नहीं चाहिए परंतु आपने अपनी नौसेना को समुद्र के पार भेजा था । उन्होंने आम और सागौन जैसी लकड़ी को काटने से मना किया उनसे अच्छी नाव का निर्माण किया जा सकता है जो नौसेना के लिए अति आवश्यक है इसके साथ-साथ अपने राज्य के पर्यावरण को बचाने में भरसक प्रयास करते थे । शिवाजी कहते थे कि दूसरे राज्य से कीमती लकडी खरीदो परन्तु अपने राज्य से लकड़ी ना काटो यदि कहीं से कोई एक लकड़ी काटनी होती तो उसके माली से आज्ञा मांगनी होती थी। इसके पश्चात  डॉ शीला टावरीजी बताती है कि उस समय हिंदुओं की बहू बेटियों को मुगल उठाकर ले जाते थे उनके साथ अनाचार किया जाता था परंतु शिवाजी ने इस तरह के कार्य पर रोक लगाने का पूरा पूरा प्रयास किया मुगलों के साथ युद्ध भी किए। शिवाजी महिलाओं की पूरी पूरी इज्जत करते थे प्रत्येक महिला को अपनी माता समान मानते थे इसका प्रमाण हमे इस किस्से में मिल जाता है एक बार की बात है जब शिवाजी का सेनापति कल्याण राज्य को जीतकर महाराज के पास आया और खुश होकर खबर सुनायी की आज हमने कल्याण राज्य जीत लिया है और मैं वहां से आपके लिए एक बेशकीमती तोहफा लेकर आया हूं आशा करता हूं कि वह आपको पसंद आएगा। शिवाजी ने आश्चर्य से देखा और कहा कि बताओ क्या तोहफा हमारे लिए लेकर आए हो तभी सेनापति ने पास में रखी हुई एक पालकी की ओर इशारा किया और जो पालकी के पर्दे उठाए गए तो उसमें एक अद्वितीय सुंदरी बैठी हुई थी जिसको देखकर शिवाजी ने उत्तर दिया ,"वाह यदि हमारी माता इतनी सुंदर होती तो हम भी इतने ही सुंदर होते" यह बात प्रत्येक व्यक्ति के लिए प्रेरणादायक है उन्होंने उस महिला को अपनी माता समान समझा और उनको कहा कि माता प्रणाम!  इसके पश्चात शिवाजी ने आदेश दिया की इस महिला को उसके राज्यों में छोड़ दिया जाए।  जब वह महिला उसके घर पहुंचा दी गई तो शिवाजी ने अपने सैनिकों को डांट फटकार लगाई और कहा कि तुमने आज मेरे राज्य और मेरे सेनादल की गरिमा पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया मुझे बहुत ही कष्ट हो रहा है इस तरह के थे हमारे महाराज शिवाजी।  हमें छत्रपति शिवाजी से सीख लेनी चाहिए इतना बड़ा राजा होने के बाद भी वह प्रत्येक स्त्री का सम्मान करता था जनता का सम्मान करता था उन सभी को अपना संरक्षण प्रदान करता था।

कार्यक्रम में प्रांत अध्यक्ष प्रोफेसर बीरपाल सिंह, प्रांत संयोजक अवनीश त्यागी, गौतम बुद्ध जिला संयोजक डॉ भूपेंद्र सिंह, गाजियाबाद जिला संयोजक योगेश शर्मा, गाजियाबाद महानगर संयोजक डॉ पूनम शर्मा, श्रीकांत कुमार, हस्तिनापुर संदेश पत्रिका के संपादक डॉ सूर्य प्रकाश अग्रवाल, कार्यकारी संपादन डॉ वंदना वर्मा, डॉ चित्रा, डॉ जी.आर. गुप्ता, डॉ नितिन कुमार सिंह, डॉ बिंदु शर्मा, डॉ पृथ्वी काला देवभूमि विचार मंच, डॉ विवेक मिश्रा, डॉ मनीषा अग्रवाल, डॉ मोहित त्यागी, डॉ राज आर्यन, डॉ शुभ्रा चतुर्वेदी, सुमन शुक्ला, डॉ श्यामलेंद्रु, डॉ नीरज मौर्य,  डॉ निशा अग्रवाल, भास्कर द्विवेदी, डॉ वेगराज, डॉ संजीव पंवार, डॉ श्वेता बंसल, ललित शर्मा, डॉ शैलेंद्र, आरती मलिक, सुभाष भारद्वाज, डॉ सुशील राजपूत, डॉ ओमवीर, प्रकाश चंद, डॉ आरती मलिक, डॉ शैलेंद्र, डॉ सुधीर यादव, डॉ मनीषा, मयंक पांडेय, डॉ नीलम गुप्ता, मनीष, डॉ ओवी सिंह, डॉ अनुराधा मिश्रा, डॉ अभिषेक, अनुज, विमलेश, मानवी शर्मा, मनमोहन सिंह, सत्यम मिश्रा, महेंद्र परमार, डॉ विवेक शुक्ल, डॉ सुदेश शुक्ला, विकास गर्ग, सुशील कुमार, सुशांत शर्मा, रमेश चंद्र, डॉ अक्षय, डॉ सतीश, देवीसिंह, अरविंद कुमार, अनुज कुमार, अभिषेक आदि अनेक शिक्षाविद, प्रबुद्ध जन सहभागी रहे। 

-अवनीश त्यागी

प्रांत संयोजक

भारतीय प्रज्ञान परिषद प्रज्ञा प्रवाह मेरठ प्रांत

राष्ट्रीय व्याख्यान: आपातकाल और लोकतंत्र के संकट 46 वांं काला दिवस



देवभूमि विचार मंच के द्वारा आपातकाल और लोकतंत्र के संकट 46 वा काला दिवस विषय पर राष्ट्रीय व्याख्यान का आयोजन किया गया राष्ट्रीय व्याख्यान के मुख्य वक्ता डॉ महेश शर्मा अध्यक्ष एकात्मक मानव अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान दीनदयाल उपाध्याय शोध संस्थान नई दिल्ली थे कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रोफेसर सुरेखा डंगवाल कुलपति दून विश्वविद्यालय देहरादून के द्वारा की गई कार्यक्रम में सानिध्य के रूप में श्री भगवती प्रसाद राघव संयोजक प्रज्ञा प्रवाह पश्चिमी उत्तर प्रदेश रहे मुख्य वक्ता डॉ महेश शर्मा ने कहा 1951 से लेकर जिस चुनाव से सत्ता में कांग्रेस आई और 1971 का चुनाव जो बांग्लादेश निर्माण के बाद हुआ उस में भारी बहुमत से कांग्रेस आई इंदिरा गांधी देश के प्रधानमंत्री बने लेकिन उनके द्वारा सत्ता के दुरुपयोग करके रायबरेली सीट को हासिल किया गया हाई कोर्ट का निर्णय आया और उसमें कहां गया कि इंदिरा गांधी 6 वर्ष तक कोई भी चुनाव नहीं लड़ सकती और उनकी लोकसभा सीट को भी खतरा पैदा हो गया आपातकाल के समय गुजरात बिहार में छात्रों के आंदोलन कर्मचारियों के आंदोलन जॉर्ज फर्नांडिस के नेतृत्व में रेल हड़ताल हुई और यह सब आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ से उस वक्त आंदोलन का मुख्य मुद्दा हमें राज नहीं समाज बदलना है जयप्रकाश नारायण आंदोलन में आए क्योंकि उस वक्त राजनीति में खुली सिद्धांत हीनता चल रही थी देश में संविधान के अनुच्छेद 352 का दुरुपयोग कर आंतरिक आपातकाल लगा दिया गया था आपातकाल में सब प्रकार की आजादी जाना प्रेस पर रोक राजनीतिक लोगों को जेलों में डाल दिया गया देशभर में सब संघ कार्यालय को बंद कर दिया गया देश की संसद बंधक बन गई कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रोफेसर सुरेखा डंगवाल कुलपति दून विश्वविद्यालय देहरादून ने कहा कि जिस वक्त आपातकाल लगा था उस वक्त बुद्धिजीवी क्या कर रहे थे जो मौन है तटस्थ हैं उनका भी इतिहास लिखा जाएगा हमें उन आंकड़ों को भी सामने लाना होगा कि उस वक्त कितने छात्र आंदोलन में थे और कौन-कौन लोग आंदोलन में थे संजय गांधी प्रोफेसर डंगवाल ने कहा कि हमारे संविधान को रिव्यू किए जाने की आवश्यकता है क्योंकि जिस तरीके से 25 जून 1975 को संविधान का दुरुपयोग कर आपातकाल लगा दिया गया आने वाले दिनों में जो भारत का लोकतंत्र है वह सुरक्षित रह सके इसके लिए हमें शोध और अनुसंधान भी करने पड़ेंगे सिविल लिबर्टी कितनी बड़ी आवश्यकता है इसका महत्व समझना होगा कार्यक्रम के संयोजक डॉ राजेश पालीवाल ने कहा 26 जून 1975 को श्रीमती इंदिरा गांधी ने रेडियो में संदेश पड़ा और आजाद भारत के इतिहास में आपातकाल लागू हो गया यानी ऐसा शासन जिसमें जनता की बुनियादी संवैधानिक अधिकार भी उनके हाथ से ले लिए गए 25 जून 1975 को लोकतंत्र की एक तरह से हत्या हुई तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी एक कहने पर देश में आपातकाल लगा दिया जोकि और लोकतांत्रिक काल था इंदिरा गांधी ने संविधान को हथियार बनाकर जनता के खिलाफ इस्तेमाल किया राष्ट्रीय व्याख्यान का आयोजन श्री भगवती प्रसाद राघव संयोजक प्रज्ञा प्रवाह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दिशा निर्देशन में हुआ कार्यक्रम मैं डॉक्टर अंजली वर्मा प्रांत संयोजक देवभूमि विचार मंच सभी को धन्यवाद देते हुए कहा कि हमें उन दिनों के अनुभव को नहीं भूलना चाहिए अनुभवों से कि हम सब वे सीखते हैं जिनसे हमारा लोकतंत्र मजबूत बनेगा कार्यक्रम के आयोजन मंडल में डॉक्टर चैतन्य भंडारी अध्यक्ष देवभूमि विचार मंच श्री रवि जोशी सह प्रांत संयोजक देवभूमि विचार मंच डॉक्टर सुनील बत्रा प्राचार्य एसएम जै एन पीजी कॉलेज हरिद्वार डॉ किरनबाला डॉक्टर तीर्थ प्रकाश डॉक्टर शैलेंद्र सिंह, भारतीय प्रज्ञान परिषद मेरठ प्रांत संयोजक अवनीश त्यागी, अनुराग अग्रवाल, हस्तिनापुर संदेश पत्रिका कार्यकारी संपादिका डॉ वंदना वर्मा, डॉ रजनीश गौतम, डॉ महेश, डॉ अमित, योगेश आदि शिक्षाविद मौजूद रहे।

केवल नाम से नहीं व्यावहारिकता में भी मुलायम हैं नेताजी

 


नेताजी पर ही भारी पड़ गया बेटे का पॉलिटिक्स ज्ञान और किस तरह पूरा ड्रामा हुआ.  अनामी शरण बबल ने नेता जी पर एक लेख्‍ा लिखा था. वही लेख प्रस्‍तुत है-

अनामी शरण बबल
उत्तर प्रदेश में कई बार मुख्यमंत्री रह चुके दिग्गज समाजवादी नेता मुलयम सिंह यादव को लेकर मेरे मन में कोई बड़ा लगाव या आकर्षण नहीं था। बसपा के कांशीराम और मायावती के साथ इनका प्यार भरा नाता रहा था और सपा बसपा मिलकर ही सत्ता सुख को भोगा मगर बसपा की बहिनजी से छले जाने के बाद इनके रास्ते अलग अलग हो गए। मुलायम सिंह से 1990 के बाद कई बार मिला,बातचीत भी की मगर इसे याराना की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। मगर जब अपनी जान पहचान गहरी हो गयी तो मैं मुलायम सिंह का कायल हो गया। नाना प्रकार के आरोपों से नवाजे जाने वाले मुलायम (जिन्हें ज्यादातर लोग नेताजी कहते हैं)। ने अपने गांव सैफई की सूरत ही बदल दी है। मुलायम ने सरकारी धन का जमकर दुरूपयोग भी किया । कहने वाले कह सकते हैं कि एक गांव में एक बी ग्रेड का एयरपोर्ट बनवाने का क्या काम । मगर हवाई अड्डा सहित स्कूल कॉलेज तकनीकू सस्थान से लेकर इटावा के अपने इलाके को मीनी मुंबई का रूप दे दिया है।
 दुनिया मुलायम सिंह के बारे में चाहे जो करे या कहें मगर यहां के लोग इन्हें भगवान की तरह पूजते है। और किसी भी आदमी इटावा का होना ही नेताजी के लिए आज भी खास हो जाता है। दूसरी तरफ बड़ी बड़ी बातें करने वाले सभी दलों के लगभग एक सौ तूफानी नेताओं मे से करीब 20-22 नेताओं के पैतृक गांव और घर पर जाने का भी मौका मिला। मगर यह देखकर मैं हमेशा आहत हुआ कि गांव चाहे देवीलाल का हो या पूर्व पीएम अटल बिहारी बाजपेयी, चंद्रशेखर का। भूत (पूर्व) मुख्यमंत्रियों में मायावती (जगत बहिनजी के गांव बादलपुर में इनका महल है, मगर गांव बेहाल सड़को का खस्ताहाल और तमाम बुनियादी सुविधाएं भी दम और दिल तोडने लायक है) कल्याण सिंह लालजी टंडन से लेकर चौधरी वंशीलाल का गांव हो । तमाम दिग्गजों के गांव में जाकर कभी लगा ही नहीं मैं किसी खास आदमी के गांव में हूं। भारत के सामान्य गांवों की तरह ही बदहाली अभावग्रस्त बेनूर और बुनियादी समस्याओं से जूझते पाया। दरिद्र ग्रामीणों को अपने तथाकथित महान नेता से कोई लाभ नहीं मिला।
हालांकि यह बात थोड़ी क्या बहुतो को बहुत ज्यादा बुरी भी लग सकती है मगर बाहुबली किस्म के नेताओं के इलाको में विकास की हरियाली है। सरकारी योजनाओं का प्रभाव दिखता है और आम नागरिक भी शरीफ नेताओं की अपेक्षा अपने इन कथित बदमाश नेताओं से ज्यादा खुशहाल मिले। नौकरशाहों और प्रशासन पर भी इन बाहुबलियों का खौफ भी दिखता था। प्रजातंत्र में विकास और नागरिकों की खुशीहाली का यही पैमाना रहा तो लोग पप्पू यादव शहाबुद्दीन से लेकर कुख्यात राजा भैय्या के चरणों में लेटकर खुद को धन्य नहीं मानते।. पूरे इलाके में शहाबुद्दीन या राजा भैय्या को शादी कार्ड देने का मतलब यही होता है कि उस गरीब कन्या की शादी का सारा खर्च ये बाहुबलियों द्वारा ही वहन की जाएगी।
उधर दूसरी तरफ अत्यधिक शरीफ और लोकप्रिय माने जाने वाले नेताओं में पूर्व पीएम अटल बिहारी बाजपेयी हो या मुख्यमंत्री रहे नारायण दत्त तिवारी की नजर से तो ज्यादातर बाप अपनी कन्याओं को छिपाकर रखना चाहते थे। शराफत और लोकप्रियता के बीच इन बाहुबलियों में कौन ज्यादा शरीफ है? यह एक बड़े विवाद का गरमागरम मुद्दा बन सकता है,। कथित तौर पर शरीफजादे नेताओं की पूरी फौज और इनके अलंबरदार इससे नैतिकता का हवाला देकर परहेज करेंगे। खैर मैं कोई मुलायम का चारण करने नहीं बैठा हूं, बल्कि मुलायम के अपनों और अपने इलाके के लोगों के प्रति प्रेम को देखकर लगता है कि लोगों की परवाह किए बगैर मुलायम ने हमेशा हर उस आदमी की मदद की है जिसको वाकई मदद की जरूरत थी। मुलायम सिंह के बहाने अपने महान भारत देश के महान नेताओं के कामकाज और विकास के नजरिए की कलई खुलती है कि लगातार जीतने वाले ये नेता अपनों और अपने इलाके के प्रति कितने उदासीन रहते है।
यूपी में 1993 में विधानसभा चुनाव की पूरी कमान मुलायम सिंह यादव अकेले संभाल रखा था। दिल्ली के प्रेस के सामने मुलायम अपनी जीत की बार बार हुंकार मारते फिर रहे थे। जून 1993 के दूसरे सप्ताह में मुलायम अपने कानपुर दौरे को लेकर दिल्ली में बड़ी बड़ी बातें उछाल रहे थे। मुझे आज भी याद है कि 22 जून 1993 को कानपुर रैली और शहर भ्रमण के बहाने चुनावी अभियान का आगाज होना था। संवाददाता सम्मेलन में ही मैने टोका और कानपुर रैली को मीडिया के सामने केवल पब्लिसिटी का स्टंट बनाने का आरोप लगाया । यह बात शायद नेताजीम को खटक गयी ।
संवाददाता सम्मेलन खत्म होते ही मुलायम मेरे पास आए और हाथ पकड़कर कहा कि आपको कानपुर चलना है। और कई पत्रकारों से पूछा कि कौन कौन कानपुर चलेंगे यह बताइए मैं व्यवस्था कराता हूं। मेरे साथ फोटोग्राफर अनिल शर्मा (जो अभी इंडियन एक्सप्रेस में है ) के अलावा कानपुर के ले कोई राजी नहीं हुआ। टिकट के लिए नाम पता लिखकर दे दिए थे। तीन चार दिन की खामोशी से लगा मानो कानपुर प्लान खत्म। तभी 21 जून को किसी मुलायम प्रेमी का फोन आया कि कल सुबह साढ़े पांच बजे की ट्रेन है। आपके घर पर तैयार रहेगे गाड़ी चार बजे आ जाएगी और अनिल जी को भी तैयार रखेंगे। अनिल शर्मा को फोन कर हमलोग सुबह के लिए लगभग तैयार थे। ट्रेन सही समय पर खुली और दोपहर 12 बजे मुलायम सिंह के चार आतिथ्य सत्कारी फौज के साथ हम दोनों मुलायम दरबार में थे । उस समय वे कानपुर प्रेस से रू ब रू थे । बीच में ही मैने कोई एक सवाल दाग दिया। उस पर जवाब देने की बजाय मुलायम अपनी जगह से उठकर मेरे पास आकर बैठ गए। मेरे हाथ को अपने हाथ में लेकर पूछा कि सफर में कोई दिक्कत तो नहीं हुई.। मेरे ना कहने पर मुलायम ने कहा कि मै भी आपके साथ ही ठहरा हूं रात में बात करेंगे । यह कहते ही अपने सिपहसालारों को मुलायम नें संकेत किया और प्रेस कांफ्रेस के बीच में ही हमलोग को लेकर उनकी टोली एक होटल में पहुंची। जिसके तीसरा तल सपा के नाम आरक्षित था। मुझे जिस कमरे मे ले जाकर ठहराया गया ठीक उसके बगल वाले कमरे में ही मुलायम रूके हुए थे।
शाम को जनसभा में जाने से पहले यह मुलायम का अजब गजब चेहरा था। कानपुर के मुख्य सड़क से लेकर गली मोहल्ले की लगभग एक दर्जन मंदिर मस्जिद गुरूद्वारा चर्च में जाकर अपना माथा टेका। कोई कहीं हनुमान मंदिर तो कोई काली मंदिर तो कोई सती देवी मंदिर मे जाने के लिए गली मोहल्ले का चक्कर काटा। और शाम ढलने से पहले जब मुलायम जनसभा स्थल पर पहुंचे, तो वहां करीब 50 हजार से ज्यादा श्रोताओं की भीड़ इंतजार कर रही थी। किसी नेता के संग एक ही गाड़ी में चलने का अपना दुख होता है। उनका एक सिपहसालार आगे की सीट पर तो मेरे और अनिल के बीच मुलायम होते या एक कभी खिड़की की तरफ वे तो दूसरे गेट से हम दोनों रहते। रैली बहुत शानदार रही और रात करीब 10 बजे हमलोग होटल में पहुंचे. थोड़ी देर के बाद डाईनिंग हॉल मे करीब एक सौ सपाई. के साथ नेताजी भोजन के लिए बैठे। मगर उससे पहले लगभग हर टेबल पर जा जाकर नेताजी ने सबों का हाल खबर खैरियत ली. किसी से हाथ मिलाया ,किसी से हाथ जोड़ा तो किसी के पीठ पर हाथ फेरते हुए आखिकार मुलायम के साथ खाना से अधिक बाते होती रही। करीब एक घंटे तक सामूहिक भोजन में मुलायम अपनी टेबल से उठकर कई बार पूरे हॉल का चक्कर काटते हुए लगभग हर आदमी को और खाने के लिए आग्रह किया। अपने कार्यकर्ताओं की इतनी चिंता करने वाले नेताजी सही मायन में केवल नाम के नहीं सही मायने में दिल से जुड़े हुए एक पारिवारिक नेता की तरह रहते हैं।
अगले दिन सुबह कानपुर के सारे पेपर मुलायम वंदना से भरे पड़े थे। सुबह सुबह अखबार देखते हुए हमलोग नेताजी के साथ ही चाय और नाश्ता की। तभी मुलायम ने कहा कि यहां से आपलोग लखनउ चलिए उसके बाद कोई कार्यक्रम बनाते हैं। कानपुर से हमलोग की करीब 10-12 गाड़ियों का काफिला लखनु के लिए निकला । और रास्ते में करीब 10 स्थानों पर गाड़ी रोककर मुलायम ने 10-15 मिनट की छोटी छोटी जनसभा की। आग के गोले के समान सूरज और 45 से पार पारा के बीच 23 जून 1983 की चिलचिलाती धूप में भी सड़क किनारे हजारों लोगों की भीड़ और लंबी कतार को देखकर मेरी आंखे फटी की फटी रह गयी। पहली बार मुलायम के प्रति जनता के बेशुमार प्यार को देखकर मेरा पूरा नजरिया ही बदल गया।
देर रात तक हमलोग की सवारी लखनऊ पहुंची। हमें किसी गेस्ट हाउल में ठहराया गया था। उनके कई सिपहसालार भी गेस्ट हाउस में ही ठहरे। हमलोग के साथ ही रात का खाना लेने के बाद नेताजी ने कहा कि सुबह 10 बजे आता हूं . अगले दिन सुबह वे कई घंटो तक साथ रहे और खान पान और गप शप तथा दिल्ली में लगातार बैठकर बातचीत करने की रणनीति के साथ ही भव्य सत्कार के बाद करीब 30-35 कार्यकर्ताओं ने पूरे आवभगत के साथ दिल्ली के लिए हम दोनों को रवाना किया। दिल्ली में आते ही मैने एक लंबी रिपोर्ट लिखी -भावी मुख्यमंत्री के अभिषेक की तैयारी- रपट को शब्दार्थ फीचर फाना न्यूज एजेंसी सहित कला परिक्रमा हिन्दुस्तान फीचर्स सहित दो और एजेंसी को रिपोर्ट में आंशिक हेर फेर कर दे दी। जिससे चार पांच दिन के अंदर यही रिपोर्ट देश की लगभग 100 से भी अघिक अखबारों में अलग अलग तरह और अलग शीर्षक के साथ छप गयी।
मैने करीब 50-60 पेपर की कतरनों का एक फाईल बनाकर मुलायम के सिपहसालारों को थमा दी। करीब एक सप्ताह के बाद दिल्ली आते ही नेताजी ने फोन कर यूपी निवास में मिलते का आग्रह किया। और जब मिले तो देखते ही मुझे अपनी बांहों में भर लिया। मैने नेताजी के साथ पैतृक गांव सैफई जाने की इच्छा जाहिर की । वे एकदम खुश हो गए। फिर तो इस तरह का सिलसिला बना कि दिल्ली से इटावा तक मैं कार से पहुंचाया जाता और उधर लखनउ से नेताजी इटावा आ जाते। कई बार ऐसा संयोग हुआ कि मेरे सिपहसालारों की गाडी देर से पहुंची तो मुलायम वेट कर रहे होते या जब कभी नेताजी अपने समर्थकों के बीच देर हो जाते तो मुझे अपने कई सिपहसालारों के साथ खान पान मिष्ठान के साथ नेताजी का इंतजार करना पड़ता। तीन चार बार सैफई जाने के बाद दो और मौके पर सैफई जाना हुआ तब तक हवाई अड्डा काम करने लगा था। मुझए इनकी दिवंगत पत्नी से भी मिलने का अवसर मिला। नेताजी से तो मैं हमेशा हाथ मिलाता रहा हूं मगर उनकी पत्नी को मैने पैर छूकर प्रणाम किया तो वे भाव विभोर हो गयी। मेरी आयु को देखते हुए उन्होने मेरा हाथ पकड़ा और स्नेह दिखाते हुए बाबू बाबू कहती रही। हमदोनों के वात्सल्य मिलन को देखकर नेताजी ने भी ठहाका लगाते हुए कहा अनामी तुम तो घर में आते ही रसोईघर तक अधिकार बना लिए। मैने फौरन टिप्पणी की इसीलिए तो मैं आपसे इतना करीब होकर भी सपा में नहीं आ रहा हूं केवल घर तक ही हूं नहीं तो आपको खतरा हो जाता। बड़े स्नेहिल माहौल में इनके घर की ज्यादातर महिलाएं बहू भाई भतीजे समेत बहुत सारे लोग मुझे जान गए।
इटावा से सैफई का काफिला एक सुखद सफर होता। क्या मस्त लंबी चौड़ी सड़के औरगांव में एक अति भव्य तालाब मंदिर स्कूल अस्पताल बड़े मकान इमारतों के बीच सैफई वाकई में एक नया आकार गढता गांव लगा। 1993 में सैफई में हवाई पट्टी नहीं बनी थी। 1993 में मुख्यमंत्री बनने के बाद मुलायम ने प्रदेश से ज्यादा केवल अपने गांव और इलाके के लिए किया।
नयी सदी के आरंभ में नेताजी अपने बेटे को लेकर काफी चिंतित थे। एक तरप कांग्रेस के बाबा राहुल गांधी में उस समय काफी जोश । और लगभग यूपी विधानसभा चुनाव की कमान अपने हाथों में थाम कर एक आक्रमक युवा नेता की तरह उभरे बाबा यूपी में काफी लोकप्रियता थे। बाबा को देखकर मुलायक का रक्तचाप हमेशा उपर भागता था कि कि अपना बेटा (गाली देकर) अखिलेश कोई सबक नहीं ले रहा। बेटे को लेकर नेताजी हमेशा दुविधा में रहते थे। .बकौल नेताजी राजनीति बड़ी बदचलन होती है एक बार गोद से निकल गयी तो दोबारा पाना कठिन हो जाता है। मगर लायक नालायक बेटे के प्रलापो के बीच 2012 में चुनावी जंग फतह करने के बाद अंतत खुद सीएम बनने की बजाय बेटे को गद्दी सौंप दी।
पिछले साल मेदांता गुड़गांव में भर्ती नेताजी से काफी समय के बाद मिला। भूलने की गजनी टाईप आदत्त या बीमारी इन पर हावी होता जा रहा है। मेरे को देखकर पहले तो नहीं पहचाना पर मैं पास में बैठकर उनका हाल चाल लेता रहा और एक हाथ को अपने हाथों में ले रखा था। तभी एकाएक खुशी से खिल पड़े। अरे मैं आपको कैसे भूल सकता हूं। आप तो मेरे आड़े समय के दोस्त है। मैने उन्हें खामोश रहने का संकेत किय तो अपनी अक्खड़ शैली में उबल पड़े अरे इन डॉक्टरों का बस चले तो हर आदमी को गूंगा बना दे। अपने सीएम बेटे के परफॉरमेंस पर नेताजी ने संतोष जताया। हंसते हुए बोले कि सरऊ है अहीर और तुम लालाओं जैसा शरीफ शांत और लिहाजी है। इसको तो मैने मांजा है और अब यही सलाह दी है कि प्यार से काम कर मगर दब्बू की छवि से बचना। खैर बेटे के निकम्मेपन से कभी आहत रहने वाले मुलायम को इसकी खुशी है कि बेटे को कोई चूतिया नहीं बना सकता क्योंकि यह सरल है शालीन है मगर अब इसको कोई मूर्ख नहीं बना सकता है। हंसते हुए नेताजी ने कहा कि वो भी राजनीति जान गया है।

असम के विधायक इस्‍तीफा दे बोले- राहुल गांधी के रहते नहीं बढ़ सकती कांग्रेस आगे


गुवाहाटी। असम विधायक रूपज्‍योति कुर्मी ने इस्‍तीफा देकर कांग्रेस को झटका दिया है। कांग्रेस पार्टी छोड़ने की वजह बताते हुए रूपज्योति कुर्मी ने कहा, 'मैं कांग्रेस छोड़ रहा हूं। दिल्ली और गुवाहाटी में हाईकमान के नेता बुजुर्ग नेताओं को ही प्राथमिकता देते हैं। हमने उनसे कहा था कि कांग्रेस के पास इस बार सत्ता में आने का अच्छा मौका है। हमें एआइयूडीएफ के साथ गठबंधन नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह एक गलती होगी। अब देख लीजिए परिणाम सबके सामने है।'

उन्‍होंने यह भी कहा कि कांग्रेस अपने युवा नेताओं की नहीं सुन रही है। इसलिए सभी राज्यों में इसकी स्थिति खराब होती जा रही है। मैं विधानसभा अध्यक्ष से मिलूंगा और अपना इस्तीफा दे दूंगा। जहां तक राहुल गांधी का सवाल है, तो वह पार्टी नेतृत्व करने में असमर्थ हैं। अगर वह शीर्ष पर हैं, तो पार्टी आगे नहीं बढ़ेगी।

मानसून की पहली दस्तक

 


नजीबाबाद। मानसून की पहली दस्तक ने राहत पहुंचाई है। हल्की बूंदाबांदी ने एक ओर पसीना सुखाया है दूसरी ओर पेड़ पौधों में चमक उत्पन्न कर दी है वहीं धरती का सौंधापन आनंद देने लगा है। धूल में नहाती चिड़ियों को देखकर आनंदित होने वाला मन अब मेंढक के टर्राहट से अभीभूत हो रहा है।

मानसून की पहली बौछार ने छाते निकलवा लिए हैं और कूलर को आराम देने के संकेत दे दिए हैं। कोरोना काल के चलते मुर्झाए चेहरे हर्षित नजर आने लगे हैं। 

पीएम मोदी ने फ्रंटलाइन वर्कर्स के लिए शुरू किए छह क्रैश कोर्स

रोजगार के नए अवसर भी मिलेंगे




प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 26 राज्यों के 111 ट्रेनिंग सेंटरों से कोविड-19 हेल्थकेयर फ्रंटलाइन वर्कर्स के लिए विशेष रूप से तैयार प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ किया। इस प्रोग्राम के तहत देशभर के एक लाख फ्रंटलाइन वर्कर्स को कौशल से लैस किया जाएगा और नई चीजें सिखाई जाएंगी। इस कार्यक्रम के तहत प्रधानमंत्री मोदी ने देश की जनता से कहा कि हर सावधानी के साथ, आने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए हमें देश की तैयारियों को और बढ़ाना होगा। इसी लक्ष्य के साथ आज देश में करीब एक लाख फ्रंट लाइन कोरोना वॉरियर्स तैयार करने का महाअभियान शुरु हो रहा है। पीएम मोदी ने कहा कि ये कोर्स दो से तीन महीने में ही पूरा हो जाएगा, इसलिए ये लोग तुरंत काम के लिए उपलब्ध भी हो जाएंगे।


पीएम मोदी ने कहा कि फ्रंटलाइन वर्कर्स के विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत, उम्मीदवारों को निःशुल्क ट्रेनिंग, स्किल इंडिया का सर्टिफिकेट, भोजन व आवास सुविधा, काम पर प्रशिक्षण के साथ स्टाइपेंड और प्रमाणित उम्मीदवारों को दो लाख रुपये का दुर्घटना बीमा प्राप्त होगा। कोविड-19 हेल्थकेयर फ्रंटलाइन वर्कर्स का विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम पूरा होने के बाद उम्मीदवार डीएससी/एसएसडीएम की व्यवस्था के तहत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों, स्वास्थ्य सुविधाओं और अस्पतालों में काम कर सकेंगे। पीएम मोदी ने बताया कि कोविड-19 हेल्थकेयर फ्रंटलाइन वर्कर्स के विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम को PMKVY 3.0 के केंद्रीय घटक के अंतर्गत एक विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम के रूप में डिजाइन किया गया है और इसके लिए 273 करोड़ रुपए की राशि का आवंटन भी किया गया है।

अब हिंदी में तैयार हुई टीकाकरण वेबसाइट

 



केंद्रीय संस्थानों में बैठे अंग्रेजीदा अफसर आखिर हिंदी को सम्मान देने को मजबूर हो ही गए । देशव्यापी टीकाकरण के मामले में टीकाकरण वाली वेबसाइट हिंदी में तैयार हो, इसके लिए मुंबई के हिंदी सेवी प्रवीण जैन को चार महीने अथक प्रयास करना पड़ा। प्रवीण जैन बताते हैं कि कोरोना काल में भी भारत सरकार का स्वास्थ्य विभाग सारा काम काज अंग्रेजी में ही कर रहा है और इस वैश्विक महामारी से बचने के सभी उपाय, दिशा-निर्देश, मोबाइल एप, वेबसाइट आदि केवल अंग्रेजी में तैयार किए गए। कंपनी सचिव जैन ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालयों को लगातार पत्र लिखे और आरटीआई आवेदन लगाए। उन्होंने राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री तक का दरवाजा खटखटाया। 

अथक परिश्रम के बाद अब राष्ट्रीय कोविड टीकाकरण की वेबसाइट कोविन www.cowin.gov.in को हिंदी और मराठी समेत 11 भारतीय भाषाओं में तैयार किया गया है।


युवाओं के बीच बहुत लोकप्रिय हो रही लॉकडाउन : एक अनकही दास्ताँ


कोरोना काल में जहां समूचे विश्व समुदाय के लोग अपने-अपने घरों में सिमट कर बैठे थे वहीं कुछ लोग ऐसे भी थे जो घर बैठकर भी अपने कार्य को पूरी तन्मयता पूर्वक कर रहे थे। 

मार्च महीने से भारत में लॉकडाउन हो गया उस दौरान सरकार के प्रतिदिन नए दिशानिर्देश आ रहे थे, विश्व स्वास्थ्य संगठन से रोज नई डरावनी जानकारियां आमजन के बीच पहुँच रही थीं। कोविड-19 नाम के इस वायरस का कब खात्मा होगा इसके बारे में कोई भी स्वास्थ्य संगठन या किसी भी देश की सरकार कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं थी।

इस वैश्विक महामारी के चलते प्रवासियों का पलायन अनवरत जारी था, बहुतेरों लोगों की दो वक्त की रोटियां तक इस वैश्विक महामारी ने छीन ली थी। पूरे मानव समाज को इस वैश्विक महामारी की वजह से हर तरह का नुकसान उठाना पड़ रहा था। समूचे विश्व में बस कयास की लगाए जा सकते थे कि आगे भविष्य में क्या होगा? सबको अपना भविष्य धुँधला ही नज़र आ रहा था एवं सब लोग हैरान तथा परेशान थे।

आने वाले वर्षों में लोग इस वैश्विक महामारी को भूल नहीं पाएंगे एवं इसके बारे में आने वाली पीढियां जानना चाहेंगी लेकिन उन्हें सटीक जानकारी तभी मिल सकेगी जब लॉकडाउन एवं कोरोना से जुड़े तथ्यों को शब्दबद्ध किया जाएगा यह सोचकर समाजसेवी दिव्येन्दु राय ने लॉकडाउन : एक अनकही दास्ताँ को लिखने का निश्चय किया।

लॉकडाउन : एक अनकही दास्ताँ प्रकाशन के बाद पाठकों में लोकप्रियता के नए आयाम छू रही है, सोशल मीडिया की तस्वीरों के अनुसार उस युवा वर्ग को इस किताब को पढ़ते हुए देखा जा रहा जिन्हें किताब पढ़ने के बजाय फेसबुक, ट्विटर चलाने से फुरसत नहीं मिलती थी। पिज़्ज़ा, बर्गर के अलावा जिनकों कभी किताबों को पढ़ने में स्वाद नहीं आता था वह युवा लॉकडाउन : एक अनकही दास्ताँ के साथ फोटो शेयर करते हुए खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। युवाओं की तस्वीरें इस किताब को पढ़ते हुए लगभग हर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एवं धरातल पर देखी जा सकती हैं।



"सामाजिक मुद्दों पर महत्वपूर्ण एवं लोकप्रिय पुस्तकें अधिकांशत: अंग्रेजी में प्रकाशित होती है जबकि लॉकडाउन : एक अनकही दास्ताँ का हिन्दी में प्रकाशित होना हिन्दी भाषा के पाठकों के लिए बड़ी बात है।" 


मऊ के काछीकलॉ के रहने वाले हैं दिव्येन्दु राय


लॉकडाउन : एक अनकही दास्ताँ के लेखक दिव्येन्दु राय मऊ जनपद के कोपागंज विकासखण्ड के काछीकलॉ गॉव के मूलतः रहने वाले हैं। वह समाज के सभी वर्गों में लोकप्रिय हैं एवं युवाओं में उनकी लोकप्रियता आसमान छू रही है।

इंजीनियरिंग की पृष्ठभूमि से ताल्लुक़ रखने वाले दिव्येन्दु की लेखनी में हिन्दी भाषा पर उनकी पकड़ बेहद ही प्रभावशाली है। उनकी लेखनी सदैव समाजिक मुद्दों पर अपनी आवाज़ उठाती है तथा सामाजिक कुरीतियों का विरोध करती है।

शिक्षक माता-पिता के पुत्र होने की वजह भी दिव्येन्दु के हिन्दी के प्रति अपनेपन की एक महत्वपूर्ण वजह है। 


लॉकडाउन : एक अनकही दास्ताँ की कहानी

लॉकडाउन : एक अनकही दास्ताँ में उस हर एक पहलू की चर्चा की गई है जिसके बारे में लोग सोचना भी नहीं चाहते। इसमें राज्य सरकारों से केन्द्र सरकार के समन्वय की चर्चा भी की गई है तो वहीं प्रवासियों के आँशुओं की भी क़द्र की गई है।

कोरोना को लेकर सरकार के फैसलों से लेकर विधायिका के सदस्यों की भूमिका तक सबकी चर्चा लॉकडाउन : एक अनकही दास्ताँ में की गई है। आने वाले वर्षों में यह पुस्तक कोरोना से जुड़ी बातों एवं अनुभवों को बताने में अपनी उपयोगिता साबित करेगी एवं अपनी एक अलग पहचान बनाएगी।

प्रो. ऋषभदेव शर्मा के सम्मान में प्रकाशित अभिनंदन ग्रंथ ‘धूप के अक्षर’ का लोकार्पण

हैदराबाद,  दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा (उच्च शिक्षा और शोध संस्थान) तथा ‘साहित्य मंथन’ के संयुक्त तत्वावधान में आगामी 4 जुलाई (सोमवार) को द...